Monday, 14 July 2008

मायावती जी! चुनौतियां अंदर हैं बाहर नहीं

मायावती जी! चुनौतियां अंदर हैं बाहर नहीं
दिल्ली से लौट कर प्रभात रंजन दीन
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती समेत 45 लोगों के खिलाफ सीबीआई का अभियोग पत्र तैयार हो चुका है, बस सुप्रीमकोर्ट से मंजूरी मिलते ही उसके दाखिले की औपचारिकता होनी बाकी है। आय से अधिक संपत्ति मामले में मायावती और उनसे जुड़े अन्य 44 लोगों के खिलाफ कसा सीबीआई का कानूनी घेरा बाहरी सियासत का नतीजा है या अंदरूनी साजिश का, इसे लेकर अधिक मंथन की अब कोई गुंजाइश नहीं रही है। दिल्ली में सीबीआई के कुछ उच्च पदस्थ अधिकारी खुद यह कहते हैं कि मायावती की ओर से सुप्रीमकोर्ट में नौ मई को याचिका दाखिल नहीं की गई होती तो चार्जशीट फाइल करने का मसला फिलहाल अभी नहीं खड़ा होता।

  • सीबीआई की चार्जशीट में मायावती समेत 45 लोगों के नाम, लिस्ट 'डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट' के हाथ लगी


    केंद्र से समर्थन वापस लेने के कारण कांग्रेस की नाराजगी का मायावती को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, या सपा के बहकावे में कांग्रेस मायावती के खिलाफ ऐसा कर रही है, मायावती का यह प्रलाप भारतीय राजनीति की अनिवार्य शर्तों के तहत लाजिमी भी है। आरोप-प्रत्यारोप का चलन तो भारतीय राजनीति की खासियत है ही। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से और गहराई से नजर डालें तो पाएंगे कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को सीबीआई की मांद की तरफ ले जाने का क्रमश: प्रयास उन्हीं के कुछ खास सलाहकारों ने किया है। यह बात जानबूझकर उलझाई गई गुत्थी को सहज तार्किक तरीके से सुलझाने की है। यह बात न कांग्रेस की तरफदारी की है और न सपा की हिमायत की। यह बात उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाल रहे ताकतवर राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी के अंदर चल रही उन गतिविधियों पर निगाह डालने, उसकी परतें खोलने और विश्लेषण करने की है, जो 'खड़ाऊं राज' के बहाने सत्ताभोग का फार्मूला निकालने का रास्ता प्रशस्त करने में लगी हैं।

    ताज गलियारा मामले में जांच के बाद सीबीआई ने पांच अक्टूबर 2003 को ही मायावती के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। तब यह 175 करोड़ रूपए के 'ताज कोरीडोर' घोटाले के रूप में कुख्यात हुआ था। अक्टूबर 2003 में एफआईआर दर्ज करने के बाद से जिस मामले को सीबीआई अब तक दबाए बैठी थी, उसे नौ मई 2008 को दाखिल मायावती की याचिका ने अचानक ताजा कर दिया।

    इस याचिका पर 15 मई को सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई से 'स्टेटस रिपोर्ट' मांग ली और प्रति शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दे डाला। 10 जुलाई 2008 को सीबीआई ने सुप्रीमकोर्ट को यह जानकारी दी कि उनकी जांच पूरी हो चुकी है और वह अभियोग पत्र दाखिल करने की इजाजत चाहती है। सीबीआई ने अपने प्रति-शपथ पत्र में यह भी स्पष्ट किया कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच सुप्रीमकोर्ट के ही निर्देश पर की गई थी।

    सनद रहे, 'ताज कोरीडोर' मामले में सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को यह निर्देश दिया था कि इस प्रकरण में आर्थिक पक्ष संलग्न है, इसलिए सभी सम्बंधित लोगों की सम्पत्ति की जांच कर ली जाए। सीबीआई ने 10 जुलाई को दाखिल अपने 'काउंटर एफिडेविट' में सुप्रीमकोर्ट के इसी निर्देश का हवाला देते हुए मायावती व अन्य के खिलाफ की गई संपत्ति की जांच का 'स्टेटस' बताया और चार्जशीट दाखिल करने की इजाजत मांग ली।

    अब यह सुप्रीमकोर्ट पर है कि वह सीबीआई की इस अर्जी को खारिज करती है या उसे मंजूरी देती है। ...और सुप्रीमकोर्ट सीबीआई की अर्जी आखिर क्यों खारिज करेगी? किस कानूनी आधार पर खारिज करेगी? लिहाजा, कानूनी नजरिए से देखें तो स्थिति साफ दिखती है। लेकिन सवाल सुप्रीमकोर्ट की ओर से सीबीआई की अर्जी खारिज किए जाने या मंजूरी दिए जाने का नहीं है। सवाल यह है कि प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को नौ मई 2008 को सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल करने की विधिक सलाह किसने दी थी? ...और क्यों दी थी? अपने खिलाफ दर्ज सीबीआई केस खारिज करने की मांग करने वाली याचिका में मायावती ने यह कैसे कह दिया कि सुप्रीमकोर्ट की इजाजत लिए बगैर सीबीआई ने सम्पत्ति की जांच कर डाली। स्पष्ट है कि मायावती से कई तथ्य छुपाए गए।

    यहां तक सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों की आवश्यक पंक्तियां भी उनसे छुपा ली गइं और ऐसे समय याचिका दाखिल करने के लिए उन्हें उकसाया गया, जब राजनीति का अत्यंत संवेदनशील दौर आता दिख रहा था। यह मायावती के सलाहकारों का फैलाया हुआ मतिभ्रम ही तो था कि याचिका दाखिल करने के पहले उन्हें यह नहीं दिखा कि एक बार सीबीआई की कार्रवाई शुरू होने के बाद वे सब मामले भी जांच और विश्लेषण के दायरे में आ जाएंगे, जो उत्तर प्रदेश में सत्ता संभालने के बाद हुए, किए गए या कराए गए। सीबीआई के सूत्र तो यह भी संकेत देते हैं कि केंद्र की योजनाओं के धन राज्य की योजनाओं में स्थानान्तरित किए जाने के मामले में भी सीबीआई पड़ताल कर सकती है। ताज गलियारे की ही तरह 'गंगा एक्सप्रेस वे' का मामला कम गम्भीर नहीं, जो सीबीआई की जांच के दायरे में जाने के लिए फिट केस माना जा रहा है। आय से कहीं अधिक अकूत चल अचल सम्पत्ति जमा करने का निरंतर चल रहा सिलसिला तो सीबीआई की निगाह में है ही।

    बहरहाल, अक्टूबर 2003 में दर्ज सीबीआई के मुकदमे के खिलाफ नौ मई 2008 को जब मायावती की तरफ से सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल हुई, उस समय तक केंद्र सरकार को बसपा का समर्थन मिल रहा था। 15 मई 2008 को जब सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया, तब भी केंद्र सरकार को मायावती समर्थन दे रही थीं। फिर मायावती की याचिका एक अदूरदर्शी निर्णय का नतीजा है या सियासी दूरदृष्टि रखने वाले किसी सलाहकार के उकसावे का परिणाम? कौन हैं जो मायावती को सींखचों की तरफ ले जाने में लाभान्वित हो सकते हैं? चार्जशीट दाखिल होने की स्थिति में यदि मायावती मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देती हैं तो वे 'सत्ता-उत्तराधिकार' किसे सौंपेंगी? राजनीतिक प्रेक्षकों को यह सवाल अभी कुछ ज्यादा ही कुरेद रहा है। लेकिन सीबीआई के एक आला अधिकारी ने 45 लोगों की जो लिस्ट इस संवाददाता के सामने रखी, उससे यह साफ जाहिर है कि मायावती जिन्हें सत्ता-खड़ाऊं सौंपना चाहती हैं, वह भी अभियोग के दायरे में होगा।

    लिहाजा, मायावती को उत्तराधिकार का विकल्प सीबीआई लिस्ट के बाहर तलाशना होगा। लिस्ट के बाहर विकल्प तलाशने में यह दिक्कत तो पेश आएगी ही कि उन्हें इस स्थिति में लाने के लिए उकसावा देने वाले उनके सलाहकार विकल्प बनते हैं या मायावती के कोई 'असली' वफादार!

    सीबीआई की चार्जशीट फाइल हो जाने के बाद मायावती के पास लालू-राबड़ी फार्मूले की तरह का कोई विकल्प नहीं रहेगा। यह भी कह सकते हैं कि उन्हें ऐसा विकल्प चुनने के लायक रहने नहीं दिया गया। मुख्यमंत्री मायावती के भाई सब अभियोग के दायरे में हैं। सीबीआई की चार्जशीट के दायरे में मायावती के वे भाई सिद्धार्थ कुमार भी हैं जो केंद्र सरकार के श्रम एवं नियोजन मंत्रालय में संयुक्त निदेशक थे। उनके एकाउंट में करीब दो करोड़ रूपए पाए गए थे। इस पर उन्हें स्वैच्छिक अवकाश लेकर नौकरी छोड़ देनी पड़ी थी। सीबीआई ने अभियोग पत्र के लिए जिन 45 लोगों की फेहरिस्त बनाई है, उसमें कांशीराम की तीन बहनें स्वर्ण कौर, गुरूचरण कौर और कुलवंत कौर भी शामिल हैं।

    मुख्यमंत्री मायावती ने अपने जिस भाई आनंद कुमार को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर बाकायदा राजनीतिक मंच पर आसीन किया था और दलित प्रेरणा केंद्र का जिम्मा सौंपा था, वह भी 45 अभियोगियों की सूची में शामिल है।

    मायावती का पूरा परिवार कानून के शिकंजे में होगा, यहां तक उनके माता-पिता भी। ऐसे में उन्हें यह सवाल सालों तक सालेगा कि इस याचिका को दाखिल करने की जरूरत क्या थी? इस याचिका के कारण ही तो नहीं राजनीति के दुर्दिन देखने पड़े? सलाहकारों ने सलाह दी थी या उकसाया था? सत्ता-भोग की दौड़ में कौन साथी है कौन स्वार्थी? मायावती जी! बसपा में चुनौतियां अंदर हैं बाहर नहीं...


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    Sunday, 6 July 2008

    मौकापरस्त राजनीति का रियलिटी शो

    मौकापरस्त राजनीति का रियलिटी शो
    2006 के मार्च महीने का वह दिन भूलता नहीं जब हैदराबाद हाउस के मुगल गार्डन में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मीडिया से मुखातिब थे और वामपंथियों के साथ मिल कर समाजवादी पार्टी के नेता रामलीला मैदान में बुश की भारत यात्रा के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। बुश के खिलाफ रामलीला मैदान पर जो राजनीतिक-लीला हो रही थी उसमें सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह भी खूब आगे आगे की किरदारी निभा रहे थे। वाम के लाल झंडों के बीच सपा का लाल-हरा झंडा एकीकृत हो गया था। परमाणु करार के कंधे पर बंदूक रख कर कांग्रेस पर धांय-धांय फायर करने में अमर सिंह कभी पीछे नहीं रहे और आज उसी करार के कंधे पर सवार हो कर कांग्रेस का समर्थन देने में उन्होंने बाकी सबको पीछे छोड़ दिया।

    किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष की सरकारी यात्रा का सांसदों द्वारा काला झंडा दिखा कर विरोध किए जाने की कूटनीतिक नासमझी फिलहाल बहस का मसला नहीं है। फिलहाल बहस का मुद्दा यह भी नहीं कि पाकिस्तान को परमाणु तकनीक और हथियार मुहैया कराने वाले चीन के किसी नेता के भारत आने पर वामपंथी नेता विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं करते और भारत को आतंकवाद की आग में झोंक देने वाले भूतपूर्व जनरल परवेज मुशर्रफ के भारत आगमन के समय विरोध की आवाज क्यों नहीं बुलंद की गई थी। बहस का मुद्दा यह जरूर खड़ा है कि देश की अनिवार्यताओं को जाने-समझे बगैर विरोध का राजनीतिक-अंधत्व देश पर इतना हावी क्यों है। परमाणु करार पर राष्ट्रीय बहस की उतनी जरूरत नहीं जितनी जरूरत इस बात पर राष्ट्रीय बहस कराने की है कि देश के हमारे नेताओं को परमाणु करार की समझ कितनी है। भविष्य में देश की जरूरतें क्या होंगी और भावी नस्लों के लिए क्या-क्या बंदोबस्त करने का दायित्व राजनीतिकों के कंधे पर है, इस बारे में नेताओं को कितनी फिक्र है। बहस इस बात पर होनी चाहिए।

    नेताओं की चिंता या उनकी एकाग्रचित्तता देश के जरूरी मसलों को मुस्लिम-फ्रेम या हिंदू-फ्रेम में फिट कर 'मुनाफा कमाने' की है। विश्व पटल पर विकसित देशों की ओर देखें। इन देशों ने अपनी ऊर्जा जरूरतें किस तरह पूरी कर ली हैं। जब ऊर्जा के सारे पारम्परिक संसाधन चुकते जा रहे हैं तो उसके विकल्प के बारे में कौन सोचेगा? परमाणु ऊर्जा एकमात्र बेहतर विकल्प है। भारत के नेता भारत को कठमुल्ला बना कर क्यों रखना चाहते हैं? परमाणु करार को मुस्लिमों से जोड़ने की निम्नस्तरीय राजनीति पर मुसलमानों ने ही साफ-साफ कहा कि देश प्राथमिक है। परमाणु करार अगर देश को नुकसान करेगा तो उसमें हिंदू-मुसलमान या अन्य किसी भी धर्म को मानने वाले नागरिक का नुकसान होगा। परमाणु करार देश का मसला है, धर्म का नहीं। लेकिन इतनी समझदार बातें नेताओं को नहीं सुहातीं।

    दूसरा आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। देश में सत्ता-शक्ति-संतुलन के लिए गठबंधन और तालमेल की जरूरतों के हिमायती सियासतदानों को यह बात समझ में नहीं आती कि अंतरराष्ट्रीय जगत उससे अधिक संवेदनशील तालमेल और गठबंधनों से चलता है। सोवियत रूस के विखंडन के बाद हुए शक्ति के ध्रुवीकरण में जब रूस समेत दुनिया के सारे रूस-मुखापेक्षी देशों ने पश्चिमी गठबंधन के खिलाफ चुप्पी साध ली उस समय भारत के वामपंथी चुप क्यों हो गए? इराक पर जब अमेरिकानीत पश्चिमी गठबंधन का हमला हुआ तब रूस, चीन, क्यूबा समेत अन्य कम्युनिस्ट देशों ने चुप्पी क्यों साधे रखी? चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दुष्टताएं क्या हमें अमेरिका से रणनीतिक करार कर दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन का अनिवार्य पुर्जा बनने और सुरक्षित सीमाओं वाला ताकतवर देश होने के लिए विवश नहीं करतीं? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में परमाणु मसलों पर पश्चिमी देशों के साथ मिल कर वोट डालते रूस और चीन क्या भारत के वामपंथियों को नहीं दिखते? ...विडम्बना तो यह है कि इराक पर जब अमेरिका का हमला हुआ तब दिल्ली में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी और जब इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाया गया तब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। ये दोनों सरकारें तब चुप क्यों रहीं? सद्दाम की फांसी के मसले पर मौन साधे वामपंथी केंद्र में कांग्रेस की सरकार चलाते रहे। उस समय वामपंथियों या अन्य ऐसी पार्टियों को मुस्लिम-पक्ष क्यों नहीं दिखाई पड़ा? तब समर्थन वापस लेने की जरूरत उन्हें महसूस क्यों नहीं हुई? परमाणु करार पर उन्हें मुस्लिम-पक्ष दिखने लगा। जब यह लगने लगा कि करार के मसले पर सरकार जा सकती है और चुनाव आ सकता है तो मुस्लिम-पक्ष दिखना ही था। मुस्लिम-पक्ष का देश में इतना भर ही मतलब रहने दिया है इन राजनीतिकों ने। यह सवाल देश भर में उठता रहा है और इस पर आम चर्चाएं होती रही हैं कि परमाणु करार पर इतना ही विरोध था तो बुश के भारत आगमन के समय ही वामदलों को सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे धराशाई कर देना चाहिए था। सिद्धांत की राजनीति का एक इतिहास भी बनता! लेकिन देश में चलने वाले ये आम चर्चे नेताओं की मोटी अनैतिक खाल पर कोई असर नहीं डालते। इन्हें केवल अपनी तात्कालिक जरूरतों का खयाल रहता है।

    इतना जरूर हुआ कि परमाणु करार के बहाने देश के सारे राजनीतिक दलों का आधारभूत मौकापरस्त चरित्र पूरी तरह जगजाहिर हो गया। अवसरवादिता की दौड़ ही यदि भारतीय राजनीति की असलियत और अनिवार्यता है तो इसमें मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह ने बाकी राजनीतिक दलों को पीछे जरूर छोड़ दिया है। इस मौकापरस्ती में वामपंथी कहीं के नहीं रहे। समर्थन वापसी की उनकी गीदड़ भभकियां 'लाफ्टर-शो' साबित हुईं और बसपा की समर्थन वापसी 'फ्लॉप-शो'। बसपा की सतही अवसरवादिता से लोग पहले से परिचित रहे हैं। केंद्र सरकार को समर्थन देने पर यूएनपीए से मुलायम को निकाल देने जैसी चौपट बातें चौटाला जैसे नेता ही कर सकते हैं। चौटाला की बंजर हो चुकी राजनीति के खेत में हरियाली की आस है तो तेदेपा की डूबती नाव को बचाने के लिए नायडू को नाखुदा की तलाश है। ऐसे में यूएनपीए का अस्तित्व 39 सांसदों वाले मुलायम से है न कि चौटाला से। लिहाजा, राजनीति ने जो करवट बदली है उसमें कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने सबको बखूबी पटखनी दे दी, न यूएनपीए बचा और न लेफ्ट। परमाणु करार से किसी का कोई लेना-देना नहीं, लेना-देना सिर्फ और सिर्फ अवसर का फायदा उठाने से है... और इसमें मुलायम-अमर की नीति राजनीति के बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई है...
    प्रभात रंजन दीन
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    Monday, 30 June 2008

    कभी नहीं मरूंगा मैं

    कभी नहीं मरूंगा मैं
    एक ऐसा शख्स जिसने न केवल इतिहास बदला बल्कि भूगोल भी बदल डाला। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने दुनिया के फलक पर भारत की प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठित किया। एक ऐसा महायोद्धा जिसने युद्ध के खौफ की परिभाषा बदल डाली। एक ऐसा सेनापति जिसने दुश्मन सेना के सेनापति और उसके एक लाख सैनिकों को घुटने टेकने की विवशता का इतिहास लिख डाला। ऐसे शाश्वत योद्धा की अंतिम दैहिक यात्रा में सत्ता का भोग लगाने वाले सियासतदानों को शरीक होने की फुर्सत नहीं मिली।

    मान और अपमान हमें, सब दौर लगे पागलपन के
    कांटे फूल मिले जितने भी, स्वीकारे पूरे मन से
    इस दुनिया में कोई न रहा, सब नामी और अनाम गए
    पता नहीं सब कहां गए, कुछ सुबह गए कुछ शाम गए...

    सैन्य मान्यताओं के मुताबिक योद्धा न कभी रिटायर होता है, न कभी मरता है। फील्ड मार्शल एसएचएफजे मानेक शॉ भी सैन्य इतिहास में शाश्वत योद्धा के बतौर सम्मानित होते रहेंगे। लेकिन इस योद्धा की आखिरी दैहिक यात्रा में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री या अन्य कोई केंद्रीय काबीना मंत्री तो छोड़िए, रक्षा सचिव और सेना अध्यक्ष तक शरीक नहीं हुए। फील्ड मार्शल के अंतिम संस्कार के वक्त तीनों रक्षा सेवाओं के प्रमुखों का मौजूद रहना 'प्रोटोकॉलिक' अनिवार्यता है। लेकिन अफसोस, फील्ड मार्शल मानेक शॉ की अंतिम यात्रा में केवल रक्षा राज्य मंत्री पल्लम राजू उपस्थित थे। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री, कोई मंत्री या मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि भी शामिल नहीं हुए। केंद्रीय रक्षा मंत्री एके एंटोनी दिल्ली में राजनीति की लुंगी संभालते रहे और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करूणानिधि राजनीतिक अंधत्व को काले चश्मे से ढंकते-झांपते रह गए। देश का गौरवशाली इतिहास लिखने और दुनिया का मानचित्र बदल डालने वाले फील्ड मार्शल का यह सम्मान था या अपमान? दुनिया के देशों में इस अपमान का जो संदेश गया, उसने भारत को दोयम नस्ल के राजनीतिकों वाला देश ही माना।

    फील्ड मार्शल मानेक शॉ के दिवंगत होने पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का ठंडा रूटीन बयान जारी हो गया। केंद्र में सत्ता संभालने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गांधी या केंद्र सरकार के साथ गलबहियां डाले वामपंथी दलों के नेताओं को संवेदना जताने की फुर्सत नहीं थी। इन्हें दुकानदारी से फुर्सत तो मिले! अब तो लोकसभा चुनाव में इन्हें सामान बेचने हैं, इसमें कौन फील्ड मार्शल और कौन शहीद? ये सब राजनीतिकों के हाथों अपने-अपने समय के मुताबिक बेचे जाते हैं। खरीदने-बेचने की प्रक्रिया देश में इतनी घनी हो गई है कि हमें अपने महापुरूषों के बारे में भी कोई ध्यान नहीं रहा। महापुरूषों के बाद अब बारी मां-बाप को अपमानित करने और उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं होने की है। भारतीय समाज को राजनीतिकों ने इसी जघन्य स्थिति पर ला कर खड़ा कर किया है।

    यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि दो कौड़ी का एक नेता मरता है तो राजकीय-राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा होती है। सरकारी भवनों पर झंडे झुका दिए जाते हैं। विडम्बना देखिए, जो व्यक्ति राष्ट्र को बेच खाने और उसे अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता उसके मरने पर राष्ट्रीय झंडा झुका दिया जाता है और जो व्यक्ति राष्ट्र का सम्मान और गौरव कायम रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता, सिर कटा देने तक के लिए उद्धत रहता है, उसके दिवंगत होने पर केंद्र सरकार यह भी भूल जाती है कि सेना के तीनों अंगों के मुख्यालयों पर ही कम से कम झंडे झुका दिए जाएं। किसी को याद ही नहीं आई। देर शाम को किसी ने सुध ली तो सेना मुख्यालय पर राष्ट्रीय झंडा झुका।

    एक बार का आपको संस्मरण बताऊं। अधिक दिन पहले की बात नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। उन दिनों गुजरात में भूकंप की त्रासदी थी। सरकारी तौर पर हजारों और गैर सरकारी तौर पर एक लाख लोग मारे गए थे। अधिकांश बच्चे मरे थे। गणतंत्र दिवस मनाने आए बच्चे स्कूल की छतों के नीचे दब कर मर गए थे, लेकिन भारतीय गणतंत्र को यह सुध नहीं आई कि राष्ट्रीय शोक घोषित किया जाए। राष्ट्र के हजारों भविष्य जिंदा दफ्न हो गए, लेकिन झंडा नहीं झुका। तब श्री वाजपेयी एक कम्पनी [जो बाद में जबरदस्त जालसाज कंपनी साबित हुई] के उद्घाटन समारोह में लखनऊ आए थे। उसी दिन अपराहन राजभवन में संवाददाता सम्मेलन आयोजित था। राजभवन का सभागार ठसाठस भरा था। अटल जी अपनी पार्टी के वरिष्ठ साथियों के साथ अवतरित हुए। मीडिया की तरफ से विद्वत सवालों की श्रृंखला शुरू हुई। किसी को भूकम्प के बारे में पूछने की सामान्य जिज्ञासा भी नहीं थी। इस संवाददाता ने साहस करके प्रधानमंत्री से पूछा, 'गुजरात भूकम्प में करीब एक लाख लोग मरे। हजारों बच्चे मर गए। क्या इतना काफी नहीं था कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती और देश का झंडा कम से कम एक दिन के लिए झुका दिया जाता?' आम मीडियाई स्वभाव और चरित्र की तरह कुछ खास मीडिया साथियों ने इस सवाल को मजाक में उड़ाने की कोशिश की, कि जैसे किसी बेवकूफ ने विद्वानों के बीच कोई अटपटा सवाल कर दिया हो। देखादेखी अटल जी ने भी अपने चिरपरिचित हास के अंदाज में कहा, 'आपसे मुलाकात नहीं हुई, नहीं तो राष्ट्रीय शोक की घोषणा तो हो ही जाती।' इस जवाब पर जब उनसे कहा गया कि देश के इतने नागरिकों की दुखद मौत को हास्य में नहीं लिया जाना चाहिए, तब अटल जी अचानक गम्भीर हुए और कहा, 'चूक हो गई।' गुजरात की त्रासद मौत पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा के बारे में पूछा गया सवाल कोई व्यक्तिगत सवाल थोड़े ही था! लेकिन हमने अपने इतने छोटे-छोटे हित-लक्ष्य बना रखे हैं कि सरोकार से जुड़े सवाल भी अपने दरकार के नहीं लगते। लिहाजा, उस दिन किसी भी अखबार ने राष्ट्रीय शोक के उस सवाल और देश के प्रधानमंत्री की इतनी बड़ी सार्वजनिक स्वीकारोक्ति पर एक लाइन नहीं लिखी। समाचार लिखने में हम यह थोड़े ही देखते हैं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया सवाल किस व्यक्ति का है। सवाल अगर महत्वपूर्ण है तो वह खबर बननी चाहिए चाहे उसे किसी भी पत्रकार बंधु ने पूछा हो!

    यह एक उदाहरण नेताओं के साथ-साथ मीडिया की प्राथमिकताओं की गंदी तस्वीर दिखाता है। जिन अहम मसलों पर देश के राजनीतिक शातिराना तरीके से उपेक्षापूर्ण रवैया अख्तियार करते हैं, मीडिया को उसे मुद्दा बनाना चाहिए, तब तक जब तक नेताओं को एहसास न करा दिया जाए। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसके ठीक उल्टा ही होता है। फील्ड मार्शल की निर्वाण यात्रा में कौन नेता आया और कौन नहीं आया, इससे मानेक शॉ के विशाल व्यक्तित्व और उनके आलीशान कृतित्व पर कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन देश की सत्ता सम्भालने वाली राजनीतिक जमात अगर ऐसे व्यक्तित्वों की सम्मान-स्थापना के प्रति गंभीर नहीं है तो यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है और यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर नकारात्मक असर डाल रही है।

    फील्ड मार्शल मानेक शॉ जैसा अभूतपूर्व व्यक्तित्व आखिरी यात्रा पर हो और नेता यह सोचे कि पाकिस्तान को तोड़ने वाले सेनापति की अंतिम यात्रा में शामिल होने से मुस्लिम मतदाता नाराज हो सकता है... तो यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है। कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने जब यह कहा तो जैसे धरती ही खिसक गई। ये नेता मुस्लिमों को आखिर समझते क्या हैं? क्या उन्हें राष्ट्रीय नहीं मानते? उन्हें सिर्फ वोटर मानते हैं? क्या देश का मुस्लिम नागरिक फील्ड मार्शल मानेक शॉ को सम्मान नहीं देता? क्या भारत का मुस्लिम पाकिस्तान परस्त है? क्या इसी तुष्टिकरण की वजह से केंद्र सरकार ने तीनों सेनाध्यक्षों या अन्य किसी वरिष्ठ अधिकारी को फील्ड मार्शल की अंत्येष्टि में नहीं भेजा? इन सवालों ने अचानक केंद्र में सरकार चलाने वाली राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को घेरे में लिया है। फील्ड मार्शल मानेक शॉ की अंत्येष्टि में शामिल नहीं होने के पीछे की वजहों को कांग्रेस को देश के सामने साफ करना चाहिए। बहानेबाजी या सियासी लफ्फाजी से काम नहीं चलने वाला। अगर चूक हो गई है तो कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी अटल बिहारी वाजपेयी की तरह देश के सामने यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए, 'चूक हो गई।'... और मीडिया को इसे प्रमुखता से छापना चाहिए। यह देश का मसला है किसी व्यक्ति विशेष का नहीं। हमें अपने धर्म के पालन में कोई चूक नहीं करनी चाहिए।

    देह छोड़ कर जा चुके महापुरूषों का व्यक्तित्व इस बात के लिए मोहताज नहीं होता कि उसके अंतिम संस्कार में कौन बड़ा आया कि कौन छोटा। वह तो अपना काम कर जा चुका। काम तो अब हमें करना है... दायित्व तो अब हम
    सबको निभाना है... इस हौसले के साथ कि...
    चलाओ मुझ पर गोलियां, जलाओ मेरा आशियां
    अभी नहीं मरूंगा मैं, कभी नहीं मरूंगा मैं...

    -प्रभात रंजन दीन

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    Tuesday, 11 March 2008

    पैसा बहा कर रोक रहे हैं धार

    पैसा बहा कर रोक रहे हैं धार
     
    यूपी को विद्युत-राजधानी बनाने की परियोजना कॉरपोरेट-रेस में उलझी
     
     
    उत्तर प्रदेश को देश की विद्युत राजधानी बनाने की पहल 'कॉरपोरेट-प्रतिद्वंद्विता' के पेच में फंस गई है। विश्व के सबसे बड़े गैस आधारित बिजली प्रोजेक्ट को कानूनी पेचीदगियों में उलझाए रखने के लिए पैसे इस तरह अनाप-शनाप खर्च किए जा रहे हैं कि समानान्तर 'पैसा बहाओ प्रोजेक्ट' खड़ा होता जा रहा है। दादरी विद्युत परियोजना बनाम दादरी पैसा बहाओ परियोजना। अनिल धीरू भाई अम्बानी समूह की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सामने कॉरपोरेट मुश्किलें चाहे जो भी खड़ी की जा रही हों, लेकिन ये रोड़े दादरी के उन किसानों के नाम पर खड़े किए जा रहे हैं, जिनकी जमीनें इस परियोजना के लिए अधिग्रहीत की गई थीं। किसानों की तरफ से कानूनी लड़ाई लड़ने के नाम पर बहाए जा रहे अनाप-शनाप धन पर आयकर विभाग की निगाह टिक गई है। सूत्रों का कहना है कि आयकर विभाग ने इसकी जांच शुरू भी कर दी है।
     
    दादरी के किसानों की कानूनी लड़ाई आखिर कौन लड़ रहा है? किसान खुद या पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह? किसान खुद या फिल्म अभिनेता राज बब्बर? कानूनी लड़ाई के नाम पर हाई-रेटेड वकील-शृंखला की फीस, चार्टर प्लेन के शाहंशाहाना आवागमनों व अन्य आलीशान खर्चे कौन उठा रहा है? किसान खुद या वीपी सिंह या कि राज बब्बर? या कोई और? यह और कौन है? कॉरपोरेट-प्रतिद्वंद्विता की डोर थामे कोई समानान्तर पूंजी बिरादर या कोई धनपशु राजनीतिक?
     
    सनद रहे, 16 जून 2004 को रिलायंस इनर्जी और उत्तर प्रदेश सरकार ने साझा तौर पर गाजियाबाद के दादरी में 3740 मेगावाट गैस आधारित विद्युत परियोजना शुरू किए जाने की घोषणा की थी। इस परियोजना में अकेले उत्तर प्रदेश को कुल उत्पादन का 40 फीसदी यानी 1500 मेगावाट बिजली देने का प्रस्ताव था। दादरी में जमीन का अधिग्रहण भी हो गया लेकिन पूरी परियोजना राजनीति-पोषित कॉरपोरेट पेचोखम में उलझा कर रख दी गई।
     
    बहरहाल, आयकर विभाग के सूत्रों ने बताया पैसे बहाए जाने का सूरते हाल। बीते पांच मार्च को दादरी प्रकरण में पैरवीकार वकीलों का जो जत्था इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा उसे बाकायदा चार्टर प्लेन (वीटी-एसआरसी) से लाया गया था। प्लेन किसका था? सूत्र बताते हैं कि यह विमान दुनियाभर में मशहूर एक फैशन डिजाइनर के पति का था। मुम्बई में पंचसितारा ओबेरॉय होटल से लेकर इलाहाबाद की हवाबाजियों का खर्च कौन वहन कर रहा है? क्या वीपी सिंह? निश्चित तौर पर नहीं... क्योंकि दादरी परियोजना के लिए हुए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ वीपी सिंह की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (संख्या: 8968/2008) दाखिल है। दादरी के सीमित आयवर्ग के 21 किसानों की ओर से आठ याचिकाएं और ऐसे ही कुछ अन्य किसानों की ओर से 19 याचिकाएं दाखिल हैं। दादरी परियोजना के खिलाफ लड़ी जा रही कानूनी लड़ाई के पीछे किसान हैं तो हाई प्रोफाइल वकीलों पर किए जा रहे अनाप-शनाप खर्च के पीछे कौन है? मामले की जांच करने वाले आयकर अधिकारी इस सवाल का जवाब तलाशने में लगे हैं।
     
    उल्लेखनीय है कि अनिल अम्बानी समूह के खिलाफ 32 मामलों के वकील हाईप्रोफाइल अधिवक्ता केटीएस तुलसी और उनकी भारी-भरकम टीम है। इनमें 29 मामले अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे हैं। दो मामले मुम्बई में और एक मामला दिल्ली हाईकोर्ट में है। इनमें रिलायंस पावर आईपीओ के खिलाफ मुम्बई में चल रहा मामला भी शामिल है।
     
    Published in Daily News Activist on March 10, 2008 (Scanned copy of news is attached)
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    Wednesday, 5 March 2008

    सेनाध्यक्ष ने दबा दी सीबीआई की फाइल

    सेनाध्यक्ष ने दबा दी सीबीआई की फाइल

    जनरल के करीबी होने का फायदा लेफ्टिनेंट जनरल गौतम दत्ता को, विजिलेंस-सीबीआई नाकारा साबित

    प्रभात रंजन दीन

    थलसेना अध्यक्ष जनरल दीपक कपूर का खास होने के कारण रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय ने मध्य कमान के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल गौतम दत्ता के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआई की रिपोर्ट दबा रखी है। अकूत संपत्ति जमा करने के मामले में विजिलेंस और सीबीआई की जांच रिपोर्ट आखिरी कार्रवाई के लिए रक्षा मंत्रालय को पेश की गई थी। मंत्रालय ने उसे सेना मुख्यालय भेज दिया और सेना मुख्यालय में फाइल दबा दी गई। साफ है कि सेनाध्यक्ष ने फाइल दबवा दी। जनरल दीपक कपूर लेफ्टिनेंट जनरल गौतम दत्ता के इतने अंतरंग हैं कि उन्हें सेना की इंजीनियरिंग कोर का चीफ बनाने की हठ ठाने बैठे हैं।
    सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने की वजह से दरकिनार किए गए लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग का मध्य कमान के दागदार ओहदेदारों के बीच स्वागत है। पनाग को नहीं मालूम कितने दागी अफसरों को इस कमान में पनाह मिली हुई है। मध्य कमान के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल गौतम दत्ता भी उनमें से एक हैं। जो जितना दागदार वह उतना ही ओहदेदार। आय से अधिक सम्पत्ति जमा करने के मामले में ले. जनरल दत्ता के खिलाफ सेंट्रल विजिलेंस कमीशन ने सीबीआई जांच की सिफारिश की थी। सीबीआई जांच की रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय को पेश हुई। रक्षा मंत्रालय ने सेना मुख्यालय से मंतव्य मांगा, लेकिन सेना मुख्यालय में फाइल दबा दी गई। सीबीआई भी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग से कानूनी परामर्श की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद जांच रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय के विशेष प्रकोष्ठ को आखिरी निर्णय लेने के लिए पेश कर दी गई थी लेकिन उसे सेनाध्यक्ष के पास भेज दिया गया। कार्रवाई के लिए रक्षा मंत्रालय को दो महीने का समय दिया गया था, लेकिन समय-सीमा को ताक पर रख दिया गया।
    सनद रहे, इन्कमटैक्स विभाग ने लेफ्टिनेंट जनरल गौतम दत्ता के कोलकाता में डीबी-9, सेक्टर-9, सॉल्ट लेक स्थित आवास और 19/1- बंडेल रोड स्थित गैस एजेंसी से बड़ी तादाद में महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए थे, जिनसे उनकी अकूत सम्पत्ति का खुलासा हुआ था। गैस एजेंसी लेफ्टिनेंट जनरल गौतम दत्ता की पत्नी नूपुर दत्ता की है। बरामद दस्तावेजों में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के बड़ी संख्या में वाउचर्स, कैश डिपॉजिट स्लिप्स के अलावा ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, भारतीय स्टेट बैंक, एचडीएफसी, आईसीआईसीआई और हांगकांग एंड सिंगापुर बैंक के खाते के दस्तावेज शामिल हैं। इसमें आईसीआईसीआई बैंक का खाता (नम्बर: 000501522312) पुणे स्थित बंद गार्डन रोड ब्रांच और हांगकांग एंड सिंगापुर बैंक का खाता (नम्बर: 023609415-006) कोलकाता के रमानी चटर्जी रोड ब्रांच का पाया गया। इन्कमटैक्स अधिकारियों ने हांगकांग एंड सिंगापुर बैंक का क्रेडिट कार्ड (नम्बर: 4384599908667834) भी बरामद किया था।
    मध्य कमान में ऐसे कई घोटालों, बलात्कारों, डकैतियों, चोरियों, कब्जों, राष्ट्रद्रोही हरकतों और जालसाजियों का खुलासा होता रहा है। अभी हाल ही खतरनाक सैन्य आयुधों की आपराधिक हेराफेरी का मामला उजागर हुआ था। आपको एक बार फिर याद दिला दें, 23वीं इन्फैंट्री डिवीजन के मेजर आनंद कुमार ने सैन्य आग्नेयास्त्रों की तस्करी में आला अधिकारियों की मिलीभगत का दस्तावेजी खुलासा किया था। भ्रष्ट अधिकारियों ने एकजुट होकर मेजर आनंद को पागल घोषित कर दिया। उसे सीखचों में जकड़ कर यहीं लखनऊ मुख्यालय में नजरबंद रखा गया। बर्बरतापूर्वक पिटाई की जाती रही। जबरन मिर्गी की दवा दी जाती रही। तीन साल तक सिविल जेल में बंद रखा गया और आखिरकार नौकरी से निकाल दिया गया। सैन्य आयुध घोटाले के बारे में मेजर आनंद ने कमांडिंग अफसर, जीओसी, जीओसी इन सी से लेकर सेनाध्यक्ष तक को आधिकारिक तौर पर इत्तला की थी। घोटाले की फाइलें सेना मुख्यालय में सड़ गईं और घोटालेबाज अधिकारियों ने मेजर आनंद की जिंदगी सड़ा दी।
    इसी मध्य कमान में तत्कालीन जीओसी इन सी लेफ्टिनेंट जनरल डीएस चौहान, उनकी पत्नी मीरा चौहान, तत्कालीन ब्रिगेड कमांडर संजीव मदान, कई अन्य सेनाधिकारियों और फौजियों द्वारा छावनी क्षेत्र की एक आलीशान कोठी पर कब्जा और लूटपाट किए जाने के खिलाफ डकैती का मुकदमा तक दर्ज हो चुका है। लखनऊ मुख्यालय में सेना में भर्ती के लिए आए पचासों बच्चों की सेप्टिक टैंक में डूब कर दुखद मौत की घटना हो चुकी है। लेकिन सीमेंट गारा तक खा जाने वाले गैरीसन अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसी कमान मुख्यालय में एक सैनिक की बिटिया से बलात्कार करने वाले अधिकारी मेजर रैना को बेसाख्ता बरी किया जा चुका है और यहीं से संवेदनशील सूचनाओं वाले कम्प्यूटर चुराए जा चुके हैं। एक लम्बे अर्से तक यह कमान आईएसआई गतिविधियों का केंद्र बना रहा है और मेजर स्तर से लेकर कई अधिकारी-फौजी गिरफ्तार भी किए जा चुके हैं। यहां के अफसर फौजियों के वेतन के लिए आए लाखों रुपए उड़ाने तक की हरकतें कर चुके हैं। लेकिन इन सब मामलों में कोई कार्रवाई नहीं की गई। आईएसआई मामले में कुछ लोगों की गिरफ्तारी हुई लेकिन राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को संरक्षण देने वाले छावनी क्षेत्र में अड्‌डा जमाए उन अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जो ऊंची पहुंच वाले थे या काफी पैसे वाले।
    भ्रष्टाचार के खिलाफ असरकारक विरोध दर्ज कराने की वजह से ही भारतीय सेना के सबसे सक्रिय और संवेदनशील उत्तरी कमान के सेनापति लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग को वहां से हटा दिया गया। देश की राजनीतिक-प्रशासनिक-सैनिक व्यवस्था किस स्तर के लोगों के हाथ में है, यह जनरल पनाग के तबादला प्रकरण से एक बार फिर उजागर हुआ है। अब जनरल पनाग को मध्य कमान का सेनाध्यक्ष बनाया गया है।
    अपने देश की लोकतांत्रिक-अराजकता का परिदृश्य देखिए... सियाचिन से लेकर करगिल समेत पाकिस्तान की सबसे संवेदनशील सीमा की निगरानी रखने वाले उत्तरी कमान में पांच हजार करोड़ का राशन घोटाला हुआ। सैनिकों के लिए आया राशन खुले बाजार में बिकता पाया गया। सेना के अफसरों ने सैनिकों के लिए आने वाले अंडे और टेंट वगैरह भी बेच डाले। घोटाले उस समय हुए जब मौजूदा थलसेनाध्यक्ष जनरल कपूर उत्तरी कमान के कमांडर हुआ करते थे। जनरल कपूर से कार्यभार लेने वाले ले. जनरल पनाग ने सख्त कार्रवाइयां शुरू कीं, लेकिन कोई ठोस नतीजा निकले उसके पहले ही लेफ्टिनेंट जनरल पनाग को वहां से निबटा दिया गया। पनाग को हटा कर उत्तरी कमान का प्रभारी उस अधिकारी को बनाया जा रहा है जिस पर पांच हजार करोड़ के राशन घोटाले का सीधा आरोप है। इस अधिकारी का नाम है लेफ्टिनेंट जनरल पीसी भारद्वाज।
    अब लेफ्टिनेंट जनरल पनाग को मध्य कमान का जनरल अफसर कमांडिंग इन चीफ बना कर लखनऊ लाया गया है। 'फील्ड एरिया' से 'पीस एरिया' में आने के बावजूद जनरल पनाग को शांति नहीं मिलने वाली। इस 'पीस एरिया' में बड़ी शांति और निश्चिंतता से घोटाले हो रहे हैं और घोटालेबाज अफसरों को यहां पनाह मिल रही है। लिहाजा, यहां 'शंट' किए जाने के बावजूद भ्रष्ट व्यवस्था को जनरल पनाग जैसे अधिकारियों से पनाह नहीं मिलने वाली। मुश्किलें खड़ी होने ही वाली हैं।

    Published in Daily News Activist on March 02, 2008 (Scanned copy of news is attached)

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