दिल्ली से लौट कर प्रभात रंजन दीन
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती समेत 45 लोगों के खिलाफ सीबीआई का अभियोग पत्र तैयार हो चुका है, बस सुप्रीमकोर्ट से मंजूरी मिलते ही उसके दाखिले की औपचारिकता होनी बाकी है। आय से अधिक संपत्ति मामले में मायावती और उनसे जुड़े अन्य 44 लोगों के खिलाफ कसा सीबीआई का कानूनी घेरा बाहरी सियासत का नतीजा है या अंदरूनी साजिश का, इसे लेकर अधिक मंथन की अब कोई गुंजाइश नहीं रही है। दिल्ली में सीबीआई के कुछ उच्च पदस्थ अधिकारी खुद यह कहते हैं कि मायावती की ओर से सुप्रीमकोर्ट में नौ मई को याचिका दाखिल नहीं की गई होती तो चार्जशीट फाइल करने का मसला फिलहाल अभी नहीं खड़ा होता।
केंद्र से समर्थन वापस लेने के कारण कांग्रेस की नाराजगी का मायावती को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, या सपा के बहकावे में कांग्रेस मायावती के खिलाफ ऐसा कर रही है, मायावती का यह प्रलाप भारतीय राजनीति की अनिवार्य शर्तों के तहत लाजिमी भी है। आरोप-प्रत्यारोप का चलन तो भारतीय राजनीति की खासियत है ही। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से और गहराई से नजर डालें तो पाएंगे कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को सीबीआई की मांद की तरफ ले जाने का क्रमश: प्रयास उन्हीं के कुछ खास सलाहकारों ने किया है। यह बात जानबूझकर उलझाई गई गुत्थी को सहज तार्किक तरीके से सुलझाने की है। यह बात न कांग्रेस की तरफदारी की है और न सपा की हिमायत की। यह बात उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाल रहे ताकतवर राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी के अंदर चल रही उन गतिविधियों पर निगाह डालने, उसकी परतें खोलने और विश्लेषण करने की है, जो 'खड़ाऊं राज' के बहाने सत्ताभोग का फार्मूला निकालने का रास्ता प्रशस्त करने में लगी हैं।
ताज गलियारा मामले में जांच के बाद सीबीआई ने पांच अक्टूबर 2003 को ही मायावती के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। तब यह 175 करोड़ रूपए के 'ताज कोरीडोर' घोटाले के रूप में कुख्यात हुआ था। अक्टूबर 2003 में एफआईआर दर्ज करने के बाद से जिस मामले को सीबीआई अब तक दबाए बैठी थी, उसे नौ मई 2008 को दाखिल मायावती की याचिका ने अचानक ताजा कर दिया।
इस याचिका पर 15 मई को सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई से 'स्टेटस रिपोर्ट' मांग ली और प्रति शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दे डाला। 10 जुलाई 2008 को सीबीआई ने सुप्रीमकोर्ट को यह जानकारी दी कि उनकी जांच पूरी हो चुकी है और वह अभियोग पत्र दाखिल करने की इजाजत चाहती है। सीबीआई ने अपने प्रति-शपथ पत्र में यह भी स्पष्ट किया कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच सुप्रीमकोर्ट के ही निर्देश पर की गई थी।
सनद रहे, 'ताज कोरीडोर' मामले में सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को यह निर्देश दिया था कि इस प्रकरण में आर्थिक पक्ष संलग्न है, इसलिए सभी सम्बंधित लोगों की सम्पत्ति की जांच कर ली जाए। सीबीआई ने 10 जुलाई को दाखिल अपने 'काउंटर एफिडेविट' में सुप्रीमकोर्ट के इसी निर्देश का हवाला देते हुए मायावती व अन्य के खिलाफ की गई संपत्ति की जांच का 'स्टेटस' बताया और चार्जशीट दाखिल करने की इजाजत मांग ली।
अब यह सुप्रीमकोर्ट पर है कि वह सीबीआई की इस अर्जी को खारिज करती है या उसे मंजूरी देती है। ...और सुप्रीमकोर्ट सीबीआई की अर्जी आखिर क्यों खारिज करेगी? किस कानूनी आधार पर खारिज करेगी? लिहाजा, कानूनी नजरिए से देखें तो स्थिति साफ दिखती है। लेकिन सवाल सुप्रीमकोर्ट की ओर से सीबीआई की अर्जी खारिज किए जाने या मंजूरी दिए जाने का नहीं है। सवाल यह है कि प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को नौ मई 2008 को सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल करने की विधिक सलाह किसने दी थी? ...और क्यों दी थी? अपने खिलाफ दर्ज सीबीआई केस खारिज करने की मांग करने वाली याचिका में मायावती ने यह कैसे कह दिया कि सुप्रीमकोर्ट की इजाजत लिए बगैर सीबीआई ने सम्पत्ति की जांच कर डाली। स्पष्ट है कि मायावती से कई तथ्य छुपाए गए।
यहां तक सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों की आवश्यक पंक्तियां भी उनसे छुपा ली गइं और ऐसे समय याचिका दाखिल करने के लिए उन्हें उकसाया गया, जब राजनीति का अत्यंत संवेदनशील दौर आता दिख रहा था। यह मायावती के सलाहकारों का फैलाया हुआ मतिभ्रम ही तो था कि याचिका दाखिल करने के पहले उन्हें यह नहीं दिखा कि एक बार सीबीआई की कार्रवाई शुरू होने के बाद वे सब मामले भी जांच और विश्लेषण के दायरे में आ जाएंगे, जो उत्तर प्रदेश में सत्ता संभालने के बाद हुए, किए गए या कराए गए। सीबीआई के सूत्र तो यह भी संकेत देते हैं कि केंद्र की योजनाओं के धन राज्य की योजनाओं में स्थानान्तरित किए जाने के मामले में भी सीबीआई पड़ताल कर सकती है। ताज गलियारे की ही तरह 'गंगा एक्सप्रेस वे' का मामला कम गम्भीर नहीं, जो सीबीआई की जांच के दायरे में जाने के लिए फिट केस माना जा रहा है। आय से कहीं अधिक अकूत चल अचल सम्पत्ति जमा करने का निरंतर चल रहा सिलसिला तो सीबीआई की निगाह में है ही।
बहरहाल, अक्टूबर 2003 में दर्ज सीबीआई के मुकदमे के खिलाफ नौ मई 2008 को जब मायावती की तरफ से सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल हुई, उस समय तक केंद्र सरकार को बसपा का समर्थन मिल रहा था। 15 मई 2008 को जब सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया, तब भी केंद्र सरकार को मायावती समर्थन दे रही थीं। फिर मायावती की याचिका एक अदूरदर्शी निर्णय का नतीजा है या सियासी दूरदृष्टि रखने वाले किसी सलाहकार के उकसावे का परिणाम? कौन हैं जो मायावती को सींखचों की तरफ ले जाने में लाभान्वित हो सकते हैं? चार्जशीट दाखिल होने की स्थिति में यदि मायावती मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देती हैं तो वे 'सत्ता-उत्तराधिकार' किसे सौंपेंगी? राजनीतिक प्रेक्षकों को यह सवाल अभी कुछ ज्यादा ही कुरेद रहा है। लेकिन सीबीआई के एक आला अधिकारी ने 45 लोगों की जो लिस्ट इस संवाददाता के सामने रखी, उससे यह साफ जाहिर है कि मायावती जिन्हें सत्ता-खड़ाऊं सौंपना चाहती हैं, वह भी अभियोग के दायरे में होगा।
लिहाजा, मायावती को उत्तराधिकार का विकल्प सीबीआई लिस्ट के बाहर तलाशना होगा। लिस्ट के बाहर विकल्प तलाशने में यह दिक्कत तो पेश आएगी ही कि उन्हें इस स्थिति में लाने के लिए उकसावा देने वाले उनके सलाहकार विकल्प बनते हैं या मायावती के कोई 'असली' वफादार!
सीबीआई की चार्जशीट फाइल हो जाने के बाद मायावती के पास लालू-राबड़ी फार्मूले की तरह का कोई विकल्प नहीं रहेगा। यह भी कह सकते हैं कि उन्हें ऐसा विकल्प चुनने के लायक रहने नहीं दिया गया। मुख्यमंत्री मायावती के भाई सब अभियोग के दायरे में हैं। सीबीआई की चार्जशीट के दायरे में मायावती के वे भाई सिद्धार्थ कुमार भी हैं जो केंद्र सरकार के श्रम एवं नियोजन मंत्रालय में संयुक्त निदेशक थे। उनके एकाउंट में करीब दो करोड़ रूपए पाए गए थे। इस पर उन्हें स्वैच्छिक अवकाश लेकर नौकरी छोड़ देनी पड़ी थी। सीबीआई ने अभियोग पत्र के लिए जिन 45 लोगों की फेहरिस्त बनाई है, उसमें कांशीराम की तीन बहनें स्वर्ण कौर, गुरूचरण कौर और कुलवंत कौर भी शामिल हैं।
मुख्यमंत्री मायावती ने अपने जिस भाई आनंद कुमार को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर बाकायदा राजनीतिक मंच पर आसीन किया था और दलित प्रेरणा केंद्र का जिम्मा सौंपा था, वह भी 45 अभियोगियों की सूची में शामिल है।
मायावती का पूरा परिवार कानून के शिकंजे में होगा, यहां तक उनके माता-पिता भी। ऐसे में उन्हें यह सवाल सालों तक सालेगा कि इस याचिका को दाखिल करने की जरूरत क्या थी? इस याचिका के कारण ही तो नहीं राजनीति के दुर्दिन देखने पड़े? सलाहकारों ने सलाह दी थी या उकसाया था? सत्ता-भोग की दौड़ में कौन साथी है कौन स्वार्थी? मायावती जी! बसपा में चुनौतियां अंदर हैं बाहर नहीं...
Published in Daily News Activist on July 14, 2008 (Scanned copy of news is attached)
Mail ur comments/queries/suggestion to Mr. Prabhat Ranjan Deen at prd.dna@gmail.com
Mail ur comments/queries/suggestion to Mr. Prabhat Ranjan Deen at prd.dna@gmail.com




