Monday, 14 July 2008

मायावती जी! चुनौतियां अंदर हैं बाहर नहीं

मायावती जी! चुनौतियां अंदर हैं बाहर नहीं
दिल्ली से लौट कर प्रभात रंजन दीन
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती समेत 45 लोगों के खिलाफ सीबीआई का अभियोग पत्र तैयार हो चुका है, बस सुप्रीमकोर्ट से मंजूरी मिलते ही उसके दाखिले की औपचारिकता होनी बाकी है। आय से अधिक संपत्ति मामले में मायावती और उनसे जुड़े अन्य 44 लोगों के खिलाफ कसा सीबीआई का कानूनी घेरा बाहरी सियासत का नतीजा है या अंदरूनी साजिश का, इसे लेकर अधिक मंथन की अब कोई गुंजाइश नहीं रही है। दिल्ली में सीबीआई के कुछ उच्च पदस्थ अधिकारी खुद यह कहते हैं कि मायावती की ओर से सुप्रीमकोर्ट में नौ मई को याचिका दाखिल नहीं की गई होती तो चार्जशीट फाइल करने का मसला फिलहाल अभी नहीं खड़ा होता।

  • सीबीआई की चार्जशीट में मायावती समेत 45 लोगों के नाम, लिस्ट 'डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट' के हाथ लगी


    केंद्र से समर्थन वापस लेने के कारण कांग्रेस की नाराजगी का मायावती को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, या सपा के बहकावे में कांग्रेस मायावती के खिलाफ ऐसा कर रही है, मायावती का यह प्रलाप भारतीय राजनीति की अनिवार्य शर्तों के तहत लाजिमी भी है। आरोप-प्रत्यारोप का चलन तो भारतीय राजनीति की खासियत है ही। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से और गहराई से नजर डालें तो पाएंगे कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को सीबीआई की मांद की तरफ ले जाने का क्रमश: प्रयास उन्हीं के कुछ खास सलाहकारों ने किया है। यह बात जानबूझकर उलझाई गई गुत्थी को सहज तार्किक तरीके से सुलझाने की है। यह बात न कांग्रेस की तरफदारी की है और न सपा की हिमायत की। यह बात उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाल रहे ताकतवर राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी के अंदर चल रही उन गतिविधियों पर निगाह डालने, उसकी परतें खोलने और विश्लेषण करने की है, जो 'खड़ाऊं राज' के बहाने सत्ताभोग का फार्मूला निकालने का रास्ता प्रशस्त करने में लगी हैं।

    ताज गलियारा मामले में जांच के बाद सीबीआई ने पांच अक्टूबर 2003 को ही मायावती के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। तब यह 175 करोड़ रूपए के 'ताज कोरीडोर' घोटाले के रूप में कुख्यात हुआ था। अक्टूबर 2003 में एफआईआर दर्ज करने के बाद से जिस मामले को सीबीआई अब तक दबाए बैठी थी, उसे नौ मई 2008 को दाखिल मायावती की याचिका ने अचानक ताजा कर दिया।

    इस याचिका पर 15 मई को सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई से 'स्टेटस रिपोर्ट' मांग ली और प्रति शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दे डाला। 10 जुलाई 2008 को सीबीआई ने सुप्रीमकोर्ट को यह जानकारी दी कि उनकी जांच पूरी हो चुकी है और वह अभियोग पत्र दाखिल करने की इजाजत चाहती है। सीबीआई ने अपने प्रति-शपथ पत्र में यह भी स्पष्ट किया कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच सुप्रीमकोर्ट के ही निर्देश पर की गई थी।

    सनद रहे, 'ताज कोरीडोर' मामले में सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को यह निर्देश दिया था कि इस प्रकरण में आर्थिक पक्ष संलग्न है, इसलिए सभी सम्बंधित लोगों की सम्पत्ति की जांच कर ली जाए। सीबीआई ने 10 जुलाई को दाखिल अपने 'काउंटर एफिडेविट' में सुप्रीमकोर्ट के इसी निर्देश का हवाला देते हुए मायावती व अन्य के खिलाफ की गई संपत्ति की जांच का 'स्टेटस' बताया और चार्जशीट दाखिल करने की इजाजत मांग ली।

    अब यह सुप्रीमकोर्ट पर है कि वह सीबीआई की इस अर्जी को खारिज करती है या उसे मंजूरी देती है। ...और सुप्रीमकोर्ट सीबीआई की अर्जी आखिर क्यों खारिज करेगी? किस कानूनी आधार पर खारिज करेगी? लिहाजा, कानूनी नजरिए से देखें तो स्थिति साफ दिखती है। लेकिन सवाल सुप्रीमकोर्ट की ओर से सीबीआई की अर्जी खारिज किए जाने या मंजूरी दिए जाने का नहीं है। सवाल यह है कि प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को नौ मई 2008 को सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल करने की विधिक सलाह किसने दी थी? ...और क्यों दी थी? अपने खिलाफ दर्ज सीबीआई केस खारिज करने की मांग करने वाली याचिका में मायावती ने यह कैसे कह दिया कि सुप्रीमकोर्ट की इजाजत लिए बगैर सीबीआई ने सम्पत्ति की जांच कर डाली। स्पष्ट है कि मायावती से कई तथ्य छुपाए गए।

    यहां तक सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों की आवश्यक पंक्तियां भी उनसे छुपा ली गइं और ऐसे समय याचिका दाखिल करने के लिए उन्हें उकसाया गया, जब राजनीति का अत्यंत संवेदनशील दौर आता दिख रहा था। यह मायावती के सलाहकारों का फैलाया हुआ मतिभ्रम ही तो था कि याचिका दाखिल करने के पहले उन्हें यह नहीं दिखा कि एक बार सीबीआई की कार्रवाई शुरू होने के बाद वे सब मामले भी जांच और विश्लेषण के दायरे में आ जाएंगे, जो उत्तर प्रदेश में सत्ता संभालने के बाद हुए, किए गए या कराए गए। सीबीआई के सूत्र तो यह भी संकेत देते हैं कि केंद्र की योजनाओं के धन राज्य की योजनाओं में स्थानान्तरित किए जाने के मामले में भी सीबीआई पड़ताल कर सकती है। ताज गलियारे की ही तरह 'गंगा एक्सप्रेस वे' का मामला कम गम्भीर नहीं, जो सीबीआई की जांच के दायरे में जाने के लिए फिट केस माना जा रहा है। आय से कहीं अधिक अकूत चल अचल सम्पत्ति जमा करने का निरंतर चल रहा सिलसिला तो सीबीआई की निगाह में है ही।

    बहरहाल, अक्टूबर 2003 में दर्ज सीबीआई के मुकदमे के खिलाफ नौ मई 2008 को जब मायावती की तरफ से सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल हुई, उस समय तक केंद्र सरकार को बसपा का समर्थन मिल रहा था। 15 मई 2008 को जब सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया, तब भी केंद्र सरकार को मायावती समर्थन दे रही थीं। फिर मायावती की याचिका एक अदूरदर्शी निर्णय का नतीजा है या सियासी दूरदृष्टि रखने वाले किसी सलाहकार के उकसावे का परिणाम? कौन हैं जो मायावती को सींखचों की तरफ ले जाने में लाभान्वित हो सकते हैं? चार्जशीट दाखिल होने की स्थिति में यदि मायावती मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देती हैं तो वे 'सत्ता-उत्तराधिकार' किसे सौंपेंगी? राजनीतिक प्रेक्षकों को यह सवाल अभी कुछ ज्यादा ही कुरेद रहा है। लेकिन सीबीआई के एक आला अधिकारी ने 45 लोगों की जो लिस्ट इस संवाददाता के सामने रखी, उससे यह साफ जाहिर है कि मायावती जिन्हें सत्ता-खड़ाऊं सौंपना चाहती हैं, वह भी अभियोग के दायरे में होगा।

    लिहाजा, मायावती को उत्तराधिकार का विकल्प सीबीआई लिस्ट के बाहर तलाशना होगा। लिस्ट के बाहर विकल्प तलाशने में यह दिक्कत तो पेश आएगी ही कि उन्हें इस स्थिति में लाने के लिए उकसावा देने वाले उनके सलाहकार विकल्प बनते हैं या मायावती के कोई 'असली' वफादार!

    सीबीआई की चार्जशीट फाइल हो जाने के बाद मायावती के पास लालू-राबड़ी फार्मूले की तरह का कोई विकल्प नहीं रहेगा। यह भी कह सकते हैं कि उन्हें ऐसा विकल्प चुनने के लायक रहने नहीं दिया गया। मुख्यमंत्री मायावती के भाई सब अभियोग के दायरे में हैं। सीबीआई की चार्जशीट के दायरे में मायावती के वे भाई सिद्धार्थ कुमार भी हैं जो केंद्र सरकार के श्रम एवं नियोजन मंत्रालय में संयुक्त निदेशक थे। उनके एकाउंट में करीब दो करोड़ रूपए पाए गए थे। इस पर उन्हें स्वैच्छिक अवकाश लेकर नौकरी छोड़ देनी पड़ी थी। सीबीआई ने अभियोग पत्र के लिए जिन 45 लोगों की फेहरिस्त बनाई है, उसमें कांशीराम की तीन बहनें स्वर्ण कौर, गुरूचरण कौर और कुलवंत कौर भी शामिल हैं।

    मुख्यमंत्री मायावती ने अपने जिस भाई आनंद कुमार को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर बाकायदा राजनीतिक मंच पर आसीन किया था और दलित प्रेरणा केंद्र का जिम्मा सौंपा था, वह भी 45 अभियोगियों की सूची में शामिल है।

    मायावती का पूरा परिवार कानून के शिकंजे में होगा, यहां तक उनके माता-पिता भी। ऐसे में उन्हें यह सवाल सालों तक सालेगा कि इस याचिका को दाखिल करने की जरूरत क्या थी? इस याचिका के कारण ही तो नहीं राजनीति के दुर्दिन देखने पड़े? सलाहकारों ने सलाह दी थी या उकसाया था? सत्ता-भोग की दौड़ में कौन साथी है कौन स्वार्थी? मायावती जी! बसपा में चुनौतियां अंदर हैं बाहर नहीं...


  • Published in Daily News Activist on July 14, 2008 (Scanned copy of news is attached)
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    Sunday, 6 July 2008

    मौकापरस्त राजनीति का रियलिटी शो

    मौकापरस्त राजनीति का रियलिटी शो
    2006 के मार्च महीने का वह दिन भूलता नहीं जब हैदराबाद हाउस के मुगल गार्डन में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मीडिया से मुखातिब थे और वामपंथियों के साथ मिल कर समाजवादी पार्टी के नेता रामलीला मैदान में बुश की भारत यात्रा के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। बुश के खिलाफ रामलीला मैदान पर जो राजनीतिक-लीला हो रही थी उसमें सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह भी खूब आगे आगे की किरदारी निभा रहे थे। वाम के लाल झंडों के बीच सपा का लाल-हरा झंडा एकीकृत हो गया था। परमाणु करार के कंधे पर बंदूक रख कर कांग्रेस पर धांय-धांय फायर करने में अमर सिंह कभी पीछे नहीं रहे और आज उसी करार के कंधे पर सवार हो कर कांग्रेस का समर्थन देने में उन्होंने बाकी सबको पीछे छोड़ दिया।

    किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष की सरकारी यात्रा का सांसदों द्वारा काला झंडा दिखा कर विरोध किए जाने की कूटनीतिक नासमझी फिलहाल बहस का मसला नहीं है। फिलहाल बहस का मुद्दा यह भी नहीं कि पाकिस्तान को परमाणु तकनीक और हथियार मुहैया कराने वाले चीन के किसी नेता के भारत आने पर वामपंथी नेता विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं करते और भारत को आतंकवाद की आग में झोंक देने वाले भूतपूर्व जनरल परवेज मुशर्रफ के भारत आगमन के समय विरोध की आवाज क्यों नहीं बुलंद की गई थी। बहस का मुद्दा यह जरूर खड़ा है कि देश की अनिवार्यताओं को जाने-समझे बगैर विरोध का राजनीतिक-अंधत्व देश पर इतना हावी क्यों है। परमाणु करार पर राष्ट्रीय बहस की उतनी जरूरत नहीं जितनी जरूरत इस बात पर राष्ट्रीय बहस कराने की है कि देश के हमारे नेताओं को परमाणु करार की समझ कितनी है। भविष्य में देश की जरूरतें क्या होंगी और भावी नस्लों के लिए क्या-क्या बंदोबस्त करने का दायित्व राजनीतिकों के कंधे पर है, इस बारे में नेताओं को कितनी फिक्र है। बहस इस बात पर होनी चाहिए।

    नेताओं की चिंता या उनकी एकाग्रचित्तता देश के जरूरी मसलों को मुस्लिम-फ्रेम या हिंदू-फ्रेम में फिट कर 'मुनाफा कमाने' की है। विश्व पटल पर विकसित देशों की ओर देखें। इन देशों ने अपनी ऊर्जा जरूरतें किस तरह पूरी कर ली हैं। जब ऊर्जा के सारे पारम्परिक संसाधन चुकते जा रहे हैं तो उसके विकल्प के बारे में कौन सोचेगा? परमाणु ऊर्जा एकमात्र बेहतर विकल्प है। भारत के नेता भारत को कठमुल्ला बना कर क्यों रखना चाहते हैं? परमाणु करार को मुस्लिमों से जोड़ने की निम्नस्तरीय राजनीति पर मुसलमानों ने ही साफ-साफ कहा कि देश प्राथमिक है। परमाणु करार अगर देश को नुकसान करेगा तो उसमें हिंदू-मुसलमान या अन्य किसी भी धर्म को मानने वाले नागरिक का नुकसान होगा। परमाणु करार देश का मसला है, धर्म का नहीं। लेकिन इतनी समझदार बातें नेताओं को नहीं सुहातीं।

    दूसरा आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। देश में सत्ता-शक्ति-संतुलन के लिए गठबंधन और तालमेल की जरूरतों के हिमायती सियासतदानों को यह बात समझ में नहीं आती कि अंतरराष्ट्रीय जगत उससे अधिक संवेदनशील तालमेल और गठबंधनों से चलता है। सोवियत रूस के विखंडन के बाद हुए शक्ति के ध्रुवीकरण में जब रूस समेत दुनिया के सारे रूस-मुखापेक्षी देशों ने पश्चिमी गठबंधन के खिलाफ चुप्पी साध ली उस समय भारत के वामपंथी चुप क्यों हो गए? इराक पर जब अमेरिकानीत पश्चिमी गठबंधन का हमला हुआ तब रूस, चीन, क्यूबा समेत अन्य कम्युनिस्ट देशों ने चुप्पी क्यों साधे रखी? चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दुष्टताएं क्या हमें अमेरिका से रणनीतिक करार कर दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन का अनिवार्य पुर्जा बनने और सुरक्षित सीमाओं वाला ताकतवर देश होने के लिए विवश नहीं करतीं? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में परमाणु मसलों पर पश्चिमी देशों के साथ मिल कर वोट डालते रूस और चीन क्या भारत के वामपंथियों को नहीं दिखते? ...विडम्बना तो यह है कि इराक पर जब अमेरिका का हमला हुआ तब दिल्ली में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी और जब इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाया गया तब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। ये दोनों सरकारें तब चुप क्यों रहीं? सद्दाम की फांसी के मसले पर मौन साधे वामपंथी केंद्र में कांग्रेस की सरकार चलाते रहे। उस समय वामपंथियों या अन्य ऐसी पार्टियों को मुस्लिम-पक्ष क्यों नहीं दिखाई पड़ा? तब समर्थन वापस लेने की जरूरत उन्हें महसूस क्यों नहीं हुई? परमाणु करार पर उन्हें मुस्लिम-पक्ष दिखने लगा। जब यह लगने लगा कि करार के मसले पर सरकार जा सकती है और चुनाव आ सकता है तो मुस्लिम-पक्ष दिखना ही था। मुस्लिम-पक्ष का देश में इतना भर ही मतलब रहने दिया है इन राजनीतिकों ने। यह सवाल देश भर में उठता रहा है और इस पर आम चर्चाएं होती रही हैं कि परमाणु करार पर इतना ही विरोध था तो बुश के भारत आगमन के समय ही वामदलों को सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे धराशाई कर देना चाहिए था। सिद्धांत की राजनीति का एक इतिहास भी बनता! लेकिन देश में चलने वाले ये आम चर्चे नेताओं की मोटी अनैतिक खाल पर कोई असर नहीं डालते। इन्हें केवल अपनी तात्कालिक जरूरतों का खयाल रहता है।

    इतना जरूर हुआ कि परमाणु करार के बहाने देश के सारे राजनीतिक दलों का आधारभूत मौकापरस्त चरित्र पूरी तरह जगजाहिर हो गया। अवसरवादिता की दौड़ ही यदि भारतीय राजनीति की असलियत और अनिवार्यता है तो इसमें मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह ने बाकी राजनीतिक दलों को पीछे जरूर छोड़ दिया है। इस मौकापरस्ती में वामपंथी कहीं के नहीं रहे। समर्थन वापसी की उनकी गीदड़ भभकियां 'लाफ्टर-शो' साबित हुईं और बसपा की समर्थन वापसी 'फ्लॉप-शो'। बसपा की सतही अवसरवादिता से लोग पहले से परिचित रहे हैं। केंद्र सरकार को समर्थन देने पर यूएनपीए से मुलायम को निकाल देने जैसी चौपट बातें चौटाला जैसे नेता ही कर सकते हैं। चौटाला की बंजर हो चुकी राजनीति के खेत में हरियाली की आस है तो तेदेपा की डूबती नाव को बचाने के लिए नायडू को नाखुदा की तलाश है। ऐसे में यूएनपीए का अस्तित्व 39 सांसदों वाले मुलायम से है न कि चौटाला से। लिहाजा, राजनीति ने जो करवट बदली है उसमें कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने सबको बखूबी पटखनी दे दी, न यूएनपीए बचा और न लेफ्ट। परमाणु करार से किसी का कोई लेना-देना नहीं, लेना-देना सिर्फ और सिर्फ अवसर का फायदा उठाने से है... और इसमें मुलायम-अमर की नीति राजनीति के बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई है...
    प्रभात रंजन दीन
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