मौकापरस्त राजनीति का रियलिटी शो
2006 के मार्च महीने का वह दिन भूलता नहीं जब हैदराबाद हाउस के मुगल गार्डन में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मीडिया से मुखातिब थे और वामपंथियों के साथ मिल कर समाजवादी पार्टी के नेता रामलीला मैदान में बुश की भारत यात्रा के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। बुश के खिलाफ रामलीला मैदान पर जो राजनीतिक-लीला हो रही थी उसमें सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह भी खूब आगे आगे की किरदारी निभा रहे थे। वाम के लाल झंडों के बीच सपा का लाल-हरा झंडा एकीकृत हो गया था। परमाणु करार के कंधे पर बंदूक रख कर कांग्रेस पर धांय-धांय फायर करने में अमर सिंह कभी पीछे नहीं रहे और आज उसी करार के कंधे पर सवार हो कर कांग्रेस का समर्थन देने में उन्होंने बाकी सबको पीछे छोड़ दिया।
किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष की सरकारी यात्रा का सांसदों द्वारा काला झंडा दिखा कर विरोध किए जाने की कूटनीतिक नासमझी फिलहाल बहस का मसला नहीं है। फिलहाल बहस का मुद्दा यह भी नहीं कि पाकिस्तान को परमाणु तकनीक और हथियार मुहैया कराने वाले चीन के किसी नेता के भारत आने पर वामपंथी नेता विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं करते और भारत को आतंकवाद की आग में झोंक देने वाले भूतपूर्व जनरल परवेज मुशर्रफ के भारत आगमन के समय विरोध की आवाज क्यों नहीं बुलंद की गई थी। बहस का मुद्दा यह जरूर खड़ा है कि देश की अनिवार्यताओं को जाने-समझे बगैर विरोध का राजनीतिक-अंधत्व देश पर इतना हावी क्यों है। परमाणु करार पर राष्ट्रीय बहस की उतनी जरूरत नहीं जितनी जरूरत इस बात पर राष्ट्रीय बहस कराने की है कि देश के हमारे नेताओं को परमाणु करार की समझ कितनी है। भविष्य में देश की जरूरतें क्या होंगी और भावी नस्लों के लिए क्या-क्या बंदोबस्त करने का दायित्व राजनीतिकों के कंधे पर है, इस बारे में नेताओं को कितनी फिक्र है। बहस इस बात पर होनी चाहिए।
नेताओं की चिंता या उनकी एकाग्रचित्तता देश के जरूरी मसलों को मुस्लिम-फ्रेम या हिंदू-फ्रेम में फिट कर 'मुनाफा कमाने' की है। विश्व पटल पर विकसित देशों की ओर देखें। इन देशों ने अपनी ऊर्जा जरूरतें किस तरह पूरी कर ली हैं। जब ऊर्जा के सारे पारम्परिक संसाधन चुकते जा रहे हैं तो उसके विकल्प के बारे में कौन सोचेगा? परमाणु ऊर्जा एकमात्र बेहतर विकल्प है। भारत के नेता भारत को कठमुल्ला बना कर क्यों रखना चाहते हैं? परमाणु करार को मुस्लिमों से जोड़ने की निम्नस्तरीय राजनीति पर मुसलमानों ने ही साफ-साफ कहा कि देश प्राथमिक है। परमाणु करार अगर देश को नुकसान करेगा तो उसमें हिंदू-मुसलमान या अन्य किसी भी धर्म को मानने वाले नागरिक का नुकसान होगा। परमाणु करार देश का मसला है, धर्म का नहीं। लेकिन इतनी समझदार बातें नेताओं को नहीं सुहातीं।
दूसरा आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। देश में सत्ता-शक्ति-संतुलन के लिए गठबंधन और तालमेल की जरूरतों के हिमायती सियासतदानों को यह बात समझ में नहीं आती कि अंतरराष्ट्रीय जगत उससे अधिक संवेदनशील तालमेल और गठबंधनों से चलता है। सोवियत रूस के विखंडन के बाद हुए शक्ति के ध्रुवीकरण में जब रूस समेत दुनिया के सारे रूस-मुखापेक्षी देशों ने पश्चिमी गठबंधन के खिलाफ चुप्पी साध ली उस समय भारत के वामपंथी चुप क्यों हो गए? इराक पर जब अमेरिकानीत पश्चिमी गठबंधन का हमला हुआ तब रूस, चीन, क्यूबा समेत अन्य कम्युनिस्ट देशों ने चुप्पी क्यों साधे रखी? चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दुष्टताएं क्या हमें अमेरिका से रणनीतिक करार कर दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन का अनिवार्य पुर्जा बनने और सुरक्षित सीमाओं वाला ताकतवर देश होने के लिए विवश नहीं करतीं? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में परमाणु मसलों पर पश्चिमी देशों के साथ मिल कर वोट डालते रूस और चीन क्या भारत के वामपंथियों को नहीं दिखते? ...विडम्बना तो यह है कि इराक पर जब अमेरिका का हमला हुआ तब दिल्ली में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी और जब इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाया गया तब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। ये दोनों सरकारें तब चुप क्यों रहीं? सद्दाम की फांसी के मसले पर मौन साधे वामपंथी केंद्र में कांग्रेस की सरकार चलाते रहे। उस समय वामपंथियों या अन्य ऐसी पार्टियों को मुस्लिम-पक्ष क्यों नहीं दिखाई पड़ा? तब समर्थन वापस लेने की जरूरत उन्हें महसूस क्यों नहीं हुई? परमाणु करार पर उन्हें मुस्लिम-पक्ष दिखने लगा। जब यह लगने लगा कि करार के मसले पर सरकार जा सकती है और चुनाव आ सकता है तो मुस्लिम-पक्ष दिखना ही था। मुस्लिम-पक्ष का देश में इतना भर ही मतलब रहने दिया है इन राजनीतिकों ने। यह सवाल देश भर में उठता रहा है और इस पर आम चर्चाएं होती रही हैं कि परमाणु करार पर इतना ही विरोध था तो बुश के भारत आगमन के समय ही वामदलों को सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे धराशाई कर देना चाहिए था। सिद्धांत की राजनीति का एक इतिहास भी बनता! लेकिन देश में चलने वाले ये आम चर्चे नेताओं की मोटी अनैतिक खाल पर कोई असर नहीं डालते। इन्हें केवल अपनी तात्कालिक जरूरतों का खयाल रहता है।
इतना जरूर हुआ कि परमाणु करार के बहाने देश के सारे राजनीतिक दलों का आधारभूत मौकापरस्त चरित्र पूरी तरह जगजाहिर हो गया। अवसरवादिता की दौड़ ही यदि भारतीय राजनीति की असलियत और अनिवार्यता है तो इसमें मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह ने बाकी राजनीतिक दलों को पीछे जरूर छोड़ दिया है। इस मौकापरस्ती में वामपंथी कहीं के नहीं रहे। समर्थन वापसी की उनकी गीदड़ भभकियां 'लाफ्टर-शो' साबित हुईं और बसपा की समर्थन वापसी 'फ्लॉप-शो'। बसपा की सतही अवसरवादिता से लोग पहले से परिचित रहे हैं। केंद्र सरकार को समर्थन देने पर यूएनपीए से मुलायम को निकाल देने जैसी चौपट बातें चौटाला जैसे नेता ही कर सकते हैं। चौटाला की बंजर हो चुकी राजनीति के खेत में हरियाली की आस है तो तेदेपा की डूबती नाव को बचाने के लिए नायडू को नाखुदा की तलाश है। ऐसे में यूएनपीए का अस्तित्व 39 सांसदों वाले मुलायम से है न कि चौटाला से। लिहाजा, राजनीति ने जो करवट बदली है उसमें कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने सबको बखूबी पटखनी दे दी, न यूएनपीए बचा और न लेफ्ट। परमाणु करार से किसी का कोई लेना-देना नहीं, लेना-देना सिर्फ और सिर्फ अवसर का फायदा उठाने से है... और इसमें मुलायम-अमर की नीति राजनीति के बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई है...
प्रभात रंजन दीन
2006 के मार्च महीने का वह दिन भूलता नहीं जब हैदराबाद हाउस के मुगल गार्डन में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मीडिया से मुखातिब थे और वामपंथियों के साथ मिल कर समाजवादी पार्टी के नेता रामलीला मैदान में बुश की भारत यात्रा के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। बुश के खिलाफ रामलीला मैदान पर जो राजनीतिक-लीला हो रही थी उसमें सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह भी खूब आगे आगे की किरदारी निभा रहे थे। वाम के लाल झंडों के बीच सपा का लाल-हरा झंडा एकीकृत हो गया था। परमाणु करार के कंधे पर बंदूक रख कर कांग्रेस पर धांय-धांय फायर करने में अमर सिंह कभी पीछे नहीं रहे और आज उसी करार के कंधे पर सवार हो कर कांग्रेस का समर्थन देने में उन्होंने बाकी सबको पीछे छोड़ दिया।
किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष की सरकारी यात्रा का सांसदों द्वारा काला झंडा दिखा कर विरोध किए जाने की कूटनीतिक नासमझी फिलहाल बहस का मसला नहीं है। फिलहाल बहस का मुद्दा यह भी नहीं कि पाकिस्तान को परमाणु तकनीक और हथियार मुहैया कराने वाले चीन के किसी नेता के भारत आने पर वामपंथी नेता विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं करते और भारत को आतंकवाद की आग में झोंक देने वाले भूतपूर्व जनरल परवेज मुशर्रफ के भारत आगमन के समय विरोध की आवाज क्यों नहीं बुलंद की गई थी। बहस का मुद्दा यह जरूर खड़ा है कि देश की अनिवार्यताओं को जाने-समझे बगैर विरोध का राजनीतिक-अंधत्व देश पर इतना हावी क्यों है। परमाणु करार पर राष्ट्रीय बहस की उतनी जरूरत नहीं जितनी जरूरत इस बात पर राष्ट्रीय बहस कराने की है कि देश के हमारे नेताओं को परमाणु करार की समझ कितनी है। भविष्य में देश की जरूरतें क्या होंगी और भावी नस्लों के लिए क्या-क्या बंदोबस्त करने का दायित्व राजनीतिकों के कंधे पर है, इस बारे में नेताओं को कितनी फिक्र है। बहस इस बात पर होनी चाहिए।
नेताओं की चिंता या उनकी एकाग्रचित्तता देश के जरूरी मसलों को मुस्लिम-फ्रेम या हिंदू-फ्रेम में फिट कर 'मुनाफा कमाने' की है। विश्व पटल पर विकसित देशों की ओर देखें। इन देशों ने अपनी ऊर्जा जरूरतें किस तरह पूरी कर ली हैं। जब ऊर्जा के सारे पारम्परिक संसाधन चुकते जा रहे हैं तो उसके विकल्प के बारे में कौन सोचेगा? परमाणु ऊर्जा एकमात्र बेहतर विकल्प है। भारत के नेता भारत को कठमुल्ला बना कर क्यों रखना चाहते हैं? परमाणु करार को मुस्लिमों से जोड़ने की निम्नस्तरीय राजनीति पर मुसलमानों ने ही साफ-साफ कहा कि देश प्राथमिक है। परमाणु करार अगर देश को नुकसान करेगा तो उसमें हिंदू-मुसलमान या अन्य किसी भी धर्म को मानने वाले नागरिक का नुकसान होगा। परमाणु करार देश का मसला है, धर्म का नहीं। लेकिन इतनी समझदार बातें नेताओं को नहीं सुहातीं।
दूसरा आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। देश में सत्ता-शक्ति-संतुलन के लिए गठबंधन और तालमेल की जरूरतों के हिमायती सियासतदानों को यह बात समझ में नहीं आती कि अंतरराष्ट्रीय जगत उससे अधिक संवेदनशील तालमेल और गठबंधनों से चलता है। सोवियत रूस के विखंडन के बाद हुए शक्ति के ध्रुवीकरण में जब रूस समेत दुनिया के सारे रूस-मुखापेक्षी देशों ने पश्चिमी गठबंधन के खिलाफ चुप्पी साध ली उस समय भारत के वामपंथी चुप क्यों हो गए? इराक पर जब अमेरिकानीत पश्चिमी गठबंधन का हमला हुआ तब रूस, चीन, क्यूबा समेत अन्य कम्युनिस्ट देशों ने चुप्पी क्यों साधे रखी? चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दुष्टताएं क्या हमें अमेरिका से रणनीतिक करार कर दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन का अनिवार्य पुर्जा बनने और सुरक्षित सीमाओं वाला ताकतवर देश होने के लिए विवश नहीं करतीं? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में परमाणु मसलों पर पश्चिमी देशों के साथ मिल कर वोट डालते रूस और चीन क्या भारत के वामपंथियों को नहीं दिखते? ...विडम्बना तो यह है कि इराक पर जब अमेरिका का हमला हुआ तब दिल्ली में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी और जब इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाया गया तब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। ये दोनों सरकारें तब चुप क्यों रहीं? सद्दाम की फांसी के मसले पर मौन साधे वामपंथी केंद्र में कांग्रेस की सरकार चलाते रहे। उस समय वामपंथियों या अन्य ऐसी पार्टियों को मुस्लिम-पक्ष क्यों नहीं दिखाई पड़ा? तब समर्थन वापस लेने की जरूरत उन्हें महसूस क्यों नहीं हुई? परमाणु करार पर उन्हें मुस्लिम-पक्ष दिखने लगा। जब यह लगने लगा कि करार के मसले पर सरकार जा सकती है और चुनाव आ सकता है तो मुस्लिम-पक्ष दिखना ही था। मुस्लिम-पक्ष का देश में इतना भर ही मतलब रहने दिया है इन राजनीतिकों ने। यह सवाल देश भर में उठता रहा है और इस पर आम चर्चाएं होती रही हैं कि परमाणु करार पर इतना ही विरोध था तो बुश के भारत आगमन के समय ही वामदलों को सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे धराशाई कर देना चाहिए था। सिद्धांत की राजनीति का एक इतिहास भी बनता! लेकिन देश में चलने वाले ये आम चर्चे नेताओं की मोटी अनैतिक खाल पर कोई असर नहीं डालते। इन्हें केवल अपनी तात्कालिक जरूरतों का खयाल रहता है।
इतना जरूर हुआ कि परमाणु करार के बहाने देश के सारे राजनीतिक दलों का आधारभूत मौकापरस्त चरित्र पूरी तरह जगजाहिर हो गया। अवसरवादिता की दौड़ ही यदि भारतीय राजनीति की असलियत और अनिवार्यता है तो इसमें मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह ने बाकी राजनीतिक दलों को पीछे जरूर छोड़ दिया है। इस मौकापरस्ती में वामपंथी कहीं के नहीं रहे। समर्थन वापसी की उनकी गीदड़ भभकियां 'लाफ्टर-शो' साबित हुईं और बसपा की समर्थन वापसी 'फ्लॉप-शो'। बसपा की सतही अवसरवादिता से लोग पहले से परिचित रहे हैं। केंद्र सरकार को समर्थन देने पर यूएनपीए से मुलायम को निकाल देने जैसी चौपट बातें चौटाला जैसे नेता ही कर सकते हैं। चौटाला की बंजर हो चुकी राजनीति के खेत में हरियाली की आस है तो तेदेपा की डूबती नाव को बचाने के लिए नायडू को नाखुदा की तलाश है। ऐसे में यूएनपीए का अस्तित्व 39 सांसदों वाले मुलायम से है न कि चौटाला से। लिहाजा, राजनीति ने जो करवट बदली है उसमें कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने सबको बखूबी पटखनी दे दी, न यूएनपीए बचा और न लेफ्ट। परमाणु करार से किसी का कोई लेना-देना नहीं, लेना-देना सिर्फ और सिर्फ अवसर का फायदा उठाने से है... और इसमें मुलायम-अमर की नीति राजनीति के बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई है...
प्रभात रंजन दीन
Published in Daily News Activist on July 06, 2008 (Scanned copy of news is attached)
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1 comment:
I do agree with writer's point of view. The alliance between Congress and SP seem to be complete opportunistic.
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